एकचक्रो रथो यस्य दिव्यः कनकभूषणः ।
स मे भवतु सुप्रीतः पञ्चहस्तो दिवाकरः ॥ १॥
आदित्यः प्रथमं नामं द्वितीयं तु दिवाकरः ।
तृतीयं भास्करः प्रोक्तं चतुर्थं तु प्रभाकरः ॥ २॥
पञ्चमं तु सहस्रांशुः षष्ठं चैव त्रिलोचनः ।
सप्तमं हरिदश्वश्च अष्टमं तु विभावसुः ॥ ३॥
नवमं दिनकृत्प्रोक्तं दशमं द्वादशात्मकः ।
एकादशं त्रयीमूर्तिर्द्वादशं सूर्य एव च ॥ ४॥
द्वादशादित्यनामानि प्रातःकाले पठेन्नरः ।
दुःखप्रणाशनं चैव सर्वदुःखं च नश्यति ॥ ५॥
इति आदित्यद्वादशनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥
NEW POST
॥ प्रेत बाधा से बचाव ॥
1. प्रेत शक्तियों से बचाव के लिए शरीर को पाक पवित्र रखें। इसके अतिरिक्त साधक आकर्षक व सुगंधित वस्तुओं के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी का ...
Thursday, 11 May 2017
॥ आदित्यद्वादशनामस्तोत्रम् ॥
Popular Posts
-
आदि शंकराचार्य रचित भवानी अष्टकम – हिंदी अर्थ सहित न तातो न माता न बन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता। न जाया न विद्य...
-
तंत्रशास्त्र में अष्ट-भैरव का उल्लेख किया गया है। असितांग , रुरु , चंड , क्रोध , उन्मत्त , कपाली , भीषण और संहार-भैरव। यह आठ भैरव आठ दिशाओ...
-
1. प्रेत शक्तियों से बचाव के लिए शरीर को पाक पवित्र रखें। इसके अतिरिक्त साधक आकर्षक व सुगंधित वस्तुओं के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी का ...